Friday, May 5, 2023

 मैं लिखना छोड़ना चाहता हूं। मैं नहीं चाहता की मैं हर शब्द को लिखने से पहले कश्मकश से गुजरू की में ये शब्द लिखूं या नहीं, मैं नहीं चाहता की मैं मेरी नग्न भावनाओं को शब्दों के कपड़े पहनाऊं। अब ये झूठ के खेल पर मैं अंकुश लगाना चाहता हूं। मुझे अब मेरी कहानियों से कोई सांत्वना नहीं बटोरनी। 

पर मैं लिखना छोड़ भी नही सकता, मुझे सिर्फ लिखना ही आता है, तोड़ मरोड़ के, जोड़ जाड़ के, चोरी करके, मुझे सिर्फ लिखना आता है, इसीलिए मैं लिख रहा हूं। 
पर आपको ये स्मरण रहे की मैं इस कहानी से कोई सांत्वना नहीं लेना चाहता और न ही आप मुझे कोई सांत्वना देंगे।
मैं बस लिख रहा हूं और आप पढ़ रहे हैं, यहीं हमारी मुलाकात हुई और यहीं खत्म हो जाएगी। इसे ध्यान रखिए। अब अपनी पुरानी सिगरेट मैने फेंक दी है, नई जला रहा हूं, चिंता मत करिए ये दिन की दूसरी ही है।

पिताजी अच्छे आदमी थे, उमाशंकर मिश्रा उनका नाम था। हां, था। अभी अभी उनके दाह संस्कार से आ रहा हूं। अब वो नहीं रहे, कहीं चले गए हैं, कहां गए पता नहीं। मैं पैंतीस का हो जाऊंगा इस साल, पर ये बात मुझे हमेशा आश्चर्यचकित करती है की आदमी मरने के बाद कहां जाता है? धरती निगल लेती है? कि बादल उड़ा ले जाते हैं, की शेर खा जाता है? कहां जाता है आदमी मरने के बाद?
पिताजी सिगरेट बहुत पीते थे, नहीं नहीं, ऐसे आम पीने वाले जैसे नहीं पीते थे, नवाबों जैसे, एक कश लेंगे, फिर काम की व्यस्तता में उलझ जाएंगे, फिर गलती से ऐश जब उंगली पर गिरेगा तो याद आयेगा की उंगलियों के बीच में एक सिगरेट दबी है, जिसे पीना है, सो वो उसकी आखरी एक दो कश ले लेंगे और फिर नई सिगरेट और फिर वही काम की व्यस्तता। 
एक दिन, किसी को बताइएगा नहीं, बहुत पहले मैं जब सात आठ साल का रहा होऊंगा तो पिताजी की पैंट की जेब से एक सिगरेट नीचे गिर गई थी। वो बहुत देर तक नीचे गिरे हुए मुझे ताकती रही, मुझ पर हस्ती रही, क्योंकि उस सिगरेट को पता था की मैं क्या करने वाला हूं। मैने उसे उठाया, होठों के बीच चिपकाया और द्राज में पड़े लाइटर से उसे जलाया। पिताजी को जब पता लगा कि पैकेट में से एक सिगरेट कम है तो बस फिर, खूब सुताई हुई।
वो काम करने का दोगुना मजा है, जिस काम को नहीं करना चाहिए। उस काम में एक रोमांच होता है, डर होता है, पर उतना ही मज़ा भी आता है। ये मानवीय गुणों का आधार है, की मन चंचल होता है और केवल बच्चो का ही मन चंचल नही होता है, सबका होता है, उमाशंकर मिश्रा जी का भी मन चंचल था।
निन्यांवे की दिसंबर थी, मां नानी के घर गई हुईं थी और स्कूल में सर्दी की छुट्टियां चल रही थी। सर्दी की छुट्टियां में हम मोहल्ले के दोस्त सुबह सुबह क्रिकेट खेलने जाते थे, दिन भर एक दूसरे के साथ गुजारते। क्रिकेट के बाद, फुटबॉल, सितोलिया, छुपन छुपाई , खो खो वगेरह खेलते और देखत देखते शाम हो जाती। 
ऐसे ही एक दिन मैं शाम को घर वापस आ रहा था, धूप थी पर आसमान गुलाबी सा था। 
फुटबाल खेलते वक्त मेरी चप्पल टूट गई थी, सो मैं मन में डर लिए घर जा रहा था।
घर के बार कदम रखा तो चैन की सांस ली क्योंकि किसी बाहर वाले की चप्पल वहां पड़ी हुई थी। मतलब आज पिटाई से बचा जा सकता था। चप्पल घर के आदमी की नही थी, पर किसी अनजान की भी नही थी। चप्पल थी मनमोहन तिवारी की जो पिताजी के अच्छे दोस्त हुआ करते थे। शाम का वक्त था, मां घर पे थी नहीं, और पिताजी अपने लंगोटिया के साथ।

शाम। मां का घर पे ना होना। दोस्त का होना। और शराब।

आदमी लापरवाह होता है, एक समय के बाद सोचना बंद कर देता है और जब सोचना बंद कर देता है तो आराम में रहता है। 
पिताजी बैठे हुए थे, तिवारी जी के साथ, सामने ग्लास रखे थे, कांच के। मुझे याद है की मेहमानो के आने पर मां पिताजी से बोल के थक जाती थी की कांच के गिलास ऊपर से उतार दो पर पिताजी को अखबार में उस ही समय कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिल जाती। 
और आज यही आदमी दारू पीने के लिए, स्वयं उठ के कांच के गिलास निकाल लाया।
 नहीं, मेरा कहना यह है की दारू स्टील के गिलास में भी पी जा सकती थी, पर मैं दर्शाना ये चाह रहा हूं की आदमी को माहौल चाहिए होता है।
मैने पिताजी को देखा, पिताजी ने मुझे। मैने उनकी नजरों के देखा आश्चर्य, आश्चर्य की उनकी एक संतान भी है। 
चार टाफी की घूस देकर पिताजी ने मामला रफा दफा करना चाहा पर मैं ठहरा अपनी मां का बेटा, दो दिन बाद मां के सामने मैने मुंह खोल ही दिया। उस दिन दो बार सुताई हुई, पहले मां ने मारा कि ये बात पहले क्यूं नही बताई और फिर पिताजी ने सूता कि ये बात बताई ही क्यों जब टाफी की घूस दी जा चुकी थी।

मैं और पिताजी जीवन की एक ही रेखा पर चल रहे थे, पिताजी उस रेखा से पीछे आ रहा थे, मैं आगे जा रहा था। पिताजी को सिगरेट में मजा कम आने लगा था और मेरे मन में सिगरेट के प्रति आस्था बढ़ रही थी, हालांकि मैने काफी साल तक अपने आप को खूब बचाया पर जैसा मैंने कहा कि वो काम करने का दोगुना मजा है, जिस काम को नहीं करना चाहिए। उस काम में एक रोमांच होता है, डर होता है, पर उतना ही मज़ा भी आता है। ये मानवीय गुणों का आधार है, की मन चंचल होता है।
सो मन एक दिन चंचल हुआ, मैं तब तक पच्चीस साल के उम्र की जवानी वाली छोर पर था, फिर मन दूसरी बार चंचल हुआ, और फिर उसकी चंचलता को मैने रोका नहीं।
मुझे सिगरेट से बहुत नफरत थी, शुरुआत से, उसके धुएं से चिढ़ थी, ऐसा लगता था मानो मैं कैंसर की कीटाणु अपने भीतर खींच रहा हूं। ये बात मैने पिताजी को बताई थी, जिसपे वो खूब हंसे भी थे। पर मैं जीवन की रेखा से आगे बढ़ रहा था, तो मुझे समझ आने लगा की पिताजी सिगरेट क्यों नही छोड़ पाए। मैं कमाने लगा था, अपने ऊपर पूरे अधिकार से खर्चा करता था, तो सिगरेट पीने पर मुझे कोई ग्लानि नहीं हुई,.....
दो हजार तेरह तक।

मैं घर आया था, ऑफिस से छुट्टी ले कर। सोचा था अब सिगरेट छोड़ दूंगा, घर आया हूं। ट्रेन से मैने अपनी बची हुई सिगरेट को फेंक दिया था, बस एक लाइटर रख रखा था।
तीन दिन तक अपने आप को बांध के रखा, अपनी तलब को रोक के रखा। पर जैसे मैने पहले कहा था कि वो काम करने का दोगुना मजा है, जिस काम को नहीं करना चाहिए। उस काम में एक रोमांच होता है, डर होता है, पर उतना ही मज़ा भी आता है। ये मानवीय गुणों का आधार है, की मन चंचल होता है।
सो मन चंचल हुआ।
मैं घर के पास वाले पनवाड़ी के पास गया, उससे बोला कि, एक सिगरेट दे दो, पिताजी को मत बताना। उसने बोला की एक काम करो, अंदर आके पी लो, कोई नही देखेगा।
मैं अंदर घुसा तो मैने एक आदमी को अंदर खड़े देखा, मेरे चहरे पर आश्चर्य का भाव था, आश्चर्य की मेरा कोई बाप है ही नहीं। 
पर पिताजी और मनमोहन तिवारी सम भाव में थे, उन्होंने मेरे ही साथ 2 से 3 कश लिए और मेरे ही साथ घर आए।
रास्ते भर की चुप्पी से मेरे मन की ग्लानि बढ़ती जा रही थी, हर एक शांत पल मेरे सीने को चीर रहा था। पिताजी मन की बात जान गए। कंधे पे हाथ रख कर बोले " नहीं बताऊंगा तेरी मां को, चिंता मत कर", मैं सुन के खुश हो गया, पर खुशी जाहिर नही की।

रात के खाने के बाद मां ने अपने कमरे में मुझे बुलाया, उसके ठीक पहले पिताजी उस कमरे से बाहर निकले थे और मुस्कुराकर मुझसे बोले थे "निन्यांवे की दिसंबर याद है?" 
मैं अंदर गया, और मां से खूब खरी खोटी सुनी, पिताजी ने मुझसे बदल ले लिया था, और बाहर ठहाका लगा कर हस रहे थे।
पिताजी जीवन की उस रेखा से पीछे जा रहे थे, और मैं आगे जा रहा था। 
मैने कुछ दिनों के बाद सिगरेट छोड़ दी थी, चंचल मन को शांत कर लिया था, पर, पर कुछ अधूरा सा लगता था, लगता था की पिताजी से बोलूं की चलिए पिताजी, एक आखरी सिगरेट पीते हैं।
और इस सिगरेट के बीच, आपस की सारी अनकही बातें कर लेते हैं। मैं काफी साल उस एक पल का इंतजार करता रहा, पर मैने देर कर दी।
पिताजी तो चले गए, पर अपनी पैंट की जेब में दो सिगरेट छोड़ गए, एक सिगरेट तो मैने अभी अभी पी ली, और ये दूसरी पी रहा हूं, मेरे लिए ये सिगरेट पीना बहुत महत्वपूर्ण था, आप ये बात तो अब समझ ही गए होंगे, और मुझे एक बुरा आदमी घोषित नहीं करेंगे। ये संवाद मेरा आपसे नही था, मेरे बाप से था, ये वो बातें थी जो मैं उनसे नही कह पाया। और हां मुझे अभी भी आपकी कोई सांत्वना नहीं चाहिए, और बस अब हमारी मुलाकात खत्म होने ही वाली है, अब आप मुझे नही जानते, और मैं आपको नही जानता।
एक सवाल पर अभी भी हृदय में गड़ रहा है की आदमी मरने के बाद कहां जाता है? धरती निगल लेती है? कि बादल उड़ा ले जाते हैं, की शेर खा जाता है? कहां जाता है आदमी मरने के बाद?
कहां गए होंगे उमाशंकर मिश्रा? हम्म.... शायद वो इस सिगरेट का धुआं बन गए होंगे।

  मैं लिखना छोड़ना चाहता हूं। मैं नहीं चाहता की मैं हर शब्द को लिखने से पहले कश्मकश से गुजरू की में ये शब्द लिखूं या नहीं, मैं नहीं चाहता की...